Thursday, 11 August 2011
Saturday, 30 July 2011
रिश्ते
सब ज़रुरत के रिश्ते हैं रिश्तों की ज़रुरत कहाँ किस को है
सब की परवाह मुझे ही है, मेरी परवाह कहाँ किस को है
है दुनिया में लगाने को गले बहुत लोग मेरे पास
क्या किसी को गला लगाने की फुर्सत मुझे भी है |
सब की परवाह मुझे ही है, मेरी परवाह कहाँ किस को है
है दुनिया में लगाने को गले बहुत लोग मेरे पास
क्या किसी को गला लगाने की फुर्सत मुझे भी है |
मंसूर
ख़ामोशी
ख़ामोशी की भी अपनी जुबां होती है
कुछ न कहते हुए भी बहोत कुछ कहती है
अगर तुझे कहना न आये तो चुप रहना मंसूर
क्योंकि इससे लोगों में खुशफहमी बनी रहती है |
मंसूर
Wednesday, 13 July 2011
धर्म निरपेक्ष
वह किसी बड़े देश का राजा था . उसके बारे में लोग कहते थे कि वह धर्म निरपेक्ष था . एक दिन वह अपने काफिले के साथ कहीं जा रहा था. रास्ते में उसे एक विशाल गिरजाघर मिला. गिरजाघर बहुत सुन्दर था . उसके मीनार में संगमरमर लगे थे . उसके फर्श और दीवारें सस्ते पत्थर के बने थे .
उस गिरजाघर को देखकर राजा ने अपने मंत्रियों से कहा. इस गिरजाघर के पास एक मंदिर बनाओ , जिसके दीवार , मीनार और फर्श पुरे संगमरमर के हों . आखिर लोग मुझे धर्म निरपेक्ष कैसे कहेंगे . मेरे शासन में हर गिरजा घर के साथ साथ मंदिर होना चाहिए .
अब वहां मंदिर भी है. लोगों ने राजा के इस कृत्य के लिए उस राजा कि खूब जयजयकार की . आज भी उस देश में उसी राजा का राज है .
मंसूर
उस गिरजाघर को देखकर राजा ने अपने मंत्रियों से कहा. इस गिरजाघर के पास एक मंदिर बनाओ , जिसके दीवार , मीनार और फर्श पुरे संगमरमर के हों . आखिर लोग मुझे धर्म निरपेक्ष कैसे कहेंगे . मेरे शासन में हर गिरजा घर के साथ साथ मंदिर होना चाहिए .
अब वहां मंदिर भी है. लोगों ने राजा के इस कृत्य के लिए उस राजा कि खूब जयजयकार की . आज भी उस देश में उसी राजा का राज है .
मंसूर
वेश्या
एक वेश्या थी . उसका एक नियमित ग्राहक था . काम से थक हार कर वह रोजाना उस वेश्या के पास अपनी भूख मिटाने आता और अपनी भूख मिटाकर घर लौट जाता. अपनी मजदूरी का कुछ भाग उसे दे जाता.
एक दिन उसे मजदूरी नहीं मिला . उसके पास पैसे नहीं थे . लेकिन भूख लगी थी . वह वेश्या के पास गया और अपनी भूख मिटाई. जाने लगा तो उस वेश्या ने अपना मजदूरी मांगी लेकिन उसके पास पैसे नहीं थे . वेश्या ने अपनी मजदूरी के बदले उसके हाथ में बंधी हुई पुरानी दहेज़ कि घडी उतरवा ली .
वेश्या कहीं की . ग्राहक बडबडाया और चला गया .
मंसूर
एक दिन उसे मजदूरी नहीं मिला . उसके पास पैसे नहीं थे . लेकिन भूख लगी थी . वह वेश्या के पास गया और अपनी भूख मिटाई. जाने लगा तो उस वेश्या ने अपना मजदूरी मांगी लेकिन उसके पास पैसे नहीं थे . वेश्या ने अपनी मजदूरी के बदले उसके हाथ में बंधी हुई पुरानी दहेज़ कि घडी उतरवा ली .
वेश्या कहीं की . ग्राहक बडबडाया और चला गया .
मंसूर
प्रेमिका
मेरा दोस्त कहता है उसके प्रेमिका
की आँखें बहुत नशीली हैं
मानो झांककर नाप ले उसमें
पूरे समंदर की गहराइयाँ .
मेरा दोस्त कहता है उसके प्रेमिका
के गाल बहुत कोमल हैं
रुई से भी कोई मुकाबला नहीं
मानो थिरक रही हों हवा के हलके झोंकों पर .
मेरा दोस्त कहता है उसके प्रेमिका
के होंठ गुलाबी हैं
पंखुड़ियों की तरह गुलाब के
मानो सफ़ेद बादल में लाली छा गयी हो .
मेरा दोस्त कहता है उसके प्रेमिका
की खुशबु बिलकुल अनोखी
कस्तूरी से भी ज्यादा मीठी
और हमेशा बरक़रार रहने वाली .
मेरा दोस्त कहता है उसकी प्रेमिका
कुदरत की एक कलाकारी है
जो युगों युगों में कभी कभी
विरले ही अवतरित होती हैं ज़मीन पर .
मेरी प्रेमिका में वैसा कुछ भी नहीं
सीधी साधी भोली भाली
बिलकुल काले बादलों का रंग
मानों खोदा ने उसे तिरस्कार के मूड में बनाया हो .
लेकिन उसकी चंचलता
उसकी बेबाकी
उसके नखरे
उसका अधिकार जमाने का मेरे ऊपर वो रवैया .
मुझे एहसास दिलाता है
मानो इश्वर ने उसे
मेरे लिए ही बनाया था
तिरस्कार से नहीं बलके बड़े प्यार से .
क्योंकि जानता था वह
रूप से मुझे क्या लेना देना
मैं तो पढ़ लेता हूँ मन को
वह मेरे मन की है और मैं उसके मन का .
की आँखें बहुत नशीली हैं
मानो झांककर नाप ले उसमें
पूरे समंदर की गहराइयाँ .
मेरा दोस्त कहता है उसके प्रेमिका
के गाल बहुत कोमल हैं
रुई से भी कोई मुकाबला नहीं
मानो थिरक रही हों हवा के हलके झोंकों पर .
मेरा दोस्त कहता है उसके प्रेमिका
के होंठ गुलाबी हैं
पंखुड़ियों की तरह गुलाब के
मानो सफ़ेद बादल में लाली छा गयी हो .
मेरा दोस्त कहता है उसके प्रेमिका
की खुशबु बिलकुल अनोखी
कस्तूरी से भी ज्यादा मीठी
और हमेशा बरक़रार रहने वाली .
मेरा दोस्त कहता है उसकी प्रेमिका
कुदरत की एक कलाकारी है
जो युगों युगों में कभी कभी
विरले ही अवतरित होती हैं ज़मीन पर .
मेरी प्रेमिका में वैसा कुछ भी नहीं
सीधी साधी भोली भाली
बिलकुल काले बादलों का रंग
मानों खोदा ने उसे तिरस्कार के मूड में बनाया हो .
लेकिन उसकी चंचलता
उसकी बेबाकी
उसके नखरे
उसका अधिकार जमाने का मेरे ऊपर वो रवैया .
मुझे एहसास दिलाता है
मानो इश्वर ने उसे
मेरे लिए ही बनाया था
तिरस्कार से नहीं बलके बड़े प्यार से .
क्योंकि जानता था वह
रूप से मुझे क्या लेना देना
मैं तो पढ़ लेता हूँ मन को
वह मेरे मन की है और मैं उसके मन का .
मंसूर
इज़हार
आज अचानक कुछ इकरार करने का दिल करने लगा है
अपने दिल के बोग्ज़ का इज़हार करने का दिल करने लगा है
फिज़ा में मानों ग़ज़ल की समां बंध गयी हो
ऐसा मुझे क्यों अचानक लगने लगा है .
बिजली की कड़क में भी नज़्म
के मिठास का एहसास होने लगा है
फूल चाहे कोई भी हो
गुलाब ही लगने लगा है
पता नहीं क्यों
सब फिर से अपना लगने लगा है .
रात में जो ख्वाब मुझे अक्सर
परेशां करते थे
अब दिन में भी उनसे
मुझे उन्स होने लगा है
मैं नहीं जानता ये
बदलाव क्यों होने लगा है
सिर्फ वह दिन याद है जब मैं तुमसे मिला था
उसी दिन से मानो सब कुछ बदलने लगा है .
अपने दिल के बोग्ज़ का इज़हार करने का दिल करने लगा है
फिज़ा में मानों ग़ज़ल की समां बंध गयी हो
ऐसा मुझे क्यों अचानक लगने लगा है .
बिजली की कड़क में भी नज़्म
के मिठास का एहसास होने लगा है
फूल चाहे कोई भी हो
गुलाब ही लगने लगा है
अब दुश्मनों से भी दिल
लगाने का दिल करने लगा हैपता नहीं क्यों
सब फिर से अपना लगने लगा है .
रात में जो ख्वाब मुझे अक्सर
परेशां करते थे
अब दिन में भी उनसे
मुझे उन्स होने लगा है
मैं नहीं जानता ये
बदलाव क्यों होने लगा है
सिर्फ वह दिन याद है जब मैं तुमसे मिला था
उसी दिन से मानो सब कुछ बदलने लगा है .
मंसूर
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