Saturday, 17 September 2011

वाह ! क्या ज़माना आ गया


बेवकूफों को अक़ल आ गयी 
जालिमों को रहम आ गया 
शजर में बेवक्त फूल आ गया
आसमान में अचानक बादल छा गया 
वाह ! क्या ज़माना आ गया 

नैतिकता पर चल रहे लोग 
शर्म के मारे घरों में  दुबक गएँ 
गुंडे मवाली चोर उचक्कों 
के मन में नीतिओं का उबाल आ गया
वाह ! क्या ज़माना आ गया 

चोरों ने चौकीदारी हथिया ली
चौकीदारों ने समाधी लगा ली
अब चोरी बंद हो गयी है 
बस चौकीदारी टैक्स अच्छा खासा हो गया 
वाह ! क्या ज़माना आ गया 

मंसूर 

No comments:

Post a Comment