Wednesday, 13 July 2011

इज़हार


आज अचानक कुछ इकरार करने का दिल करने लगा है
अपने दिल के बोग्ज़ का इज़हार करने का दिल करने लगा है  
फिज़ा में मानों ग़ज़ल की समां बंध गयी  हो
ऐसा मुझे क्यों अचानक लगने लगा है  .

बिजली की कड़क में भी  नज़्म
के  मिठास  का  एहसास  होने  लगा  है
फूल  चाहे  कोई  भी  हो
गुलाब  ही  लगने  लगा  है

अब  दुश्मनों  से भी  दिल
लगाने   का  दिल  करने  लगा  है
पता  नहीं  क्यों
सब  फिर  से  अपना  लगने  लगा  है .

रात  में  जो  ख्वाब  मुझे  अक्सर
परेशां  करते  थे
अब  दिन  में  भी  उनसे
मुझे  उन्स  होने  लगा  है

मैं  नहीं  जानता  ये
बदलाव  क्यों  होने  लगा  है
सिर्फ वह    दिन याद  है  जब  मैं  तुमसे  मिला  था
उसी  दिन  से  मानो  सब  कुछ  बदलने  लगा  है .

मंसूर

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